कटिहार, बिहार। किसी भी राज्य की वास्तविक पहचान केवल उसकी आर्थिक विकास दर, निवेश, औद्योगिक परियोजनाओं अथवा राजनीतिक स्थिरता से नहीं होती, बल्कि उसके नगरों और कस्बों की स्वच्छता, सुव्यवस्थित यातायात, जल निकासी, कचरा प्रबंधन तथा नागरिक सुविधाओं से भी होती है। यदि सड़कें अतिक्रमण से घिरी हों, नालियाँ गंदगी से भरी हों, वर्षा का पानी दिनों तक सड़कों पर जमा रहे और नगरों में कूड़े के ढेर नागरिकों का स्वागत करें, तो विकास के बड़े-बड़े दावे भी अधूरे प्रतीत होने लगते हैं। बिहार आज तीव्र विकास की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा है, किंतु शहरी प्रबंधन की अनेक मूलभूत समस्याएँ अभी भी गंभीर चिंता का विषय बनी हुई हैं।

बिहार के अधिकांश नगरों—चाहे वे जिला मुख्यालय हों, अनुमंडल हों अथवा प्रखंड स्तर के कस्बे—लगभग एक जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। ठोस अपशिष्ट अर्थात् कूड़ा-कचरा प्रबंधन की समुचित व्यवस्था का अभाव, नालियों की नियमित सफाई न होना, वर्षा के समय जलजमाव, सड़कों और फुटपाथों पर अतिक्रमण, सड़क किनारे अनियोजित हाट-बाज़ार तथा बढ़ता यातायात दबाव आम नागरिकों के दैनिक जीवन को प्रभावित कर रहे हैं। ये समस्याएँ केवल असुविधा का विषय नहीं हैं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, पर्यावरण, व्यापार और शहरी अर्थव्यवस्था से भी प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई हैं।

कूड़ा-कचरा प्रबंधन: शहरी स्वास्थ्य की सबसे बड़ी चुनौती

सबसे गंभीर समस्या कूड़ा-कचरा प्रबंधन की है। अनेक नगरों में आज भी घर-घर से नियमित कचरा संग्रहण की व्यवस्था या तो पूरी तरह विकसित नहीं है अथवा उसका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है। परिणामस्वरूप लोग सड़क किनारे, नालियों के पास अथवा खाली भूखंडों पर कचरा फेंकने को विवश हो जाते हैं। धीरे-धीरे यही स्थान अस्थायी कूड़ाघर बन जाते हैं, जहाँ से दुर्गंध, मच्छर, मक्खियाँ और विभिन्न प्रकार के संक्रमण फैलने की आशंका बनी रहती है।

कचरे की समस्या का दूसरा पक्ष उसका वैज्ञानिक निस्तारण है। केवल कचरा उठाना पर्याप्त नहीं है; उसका पृथक्करण, पुनर्चक्रण और वैज्ञानिक प्रसंस्करण भी उतना ही आवश्यक है। आज भी अधिकांश नगरों में गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग एकत्र करने की संस्कृति विकसित नहीं हो सकी है। इससे पुनर्चक्रण की संभावनाएँ कम हो जाती हैं और नगर निकायों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।

"विकास की पहचान केवल ऊँची इमारतों और चौड़ी सड़कों से नहीं होती, बल्कि स्वच्छ गलियों, सुगम यातायात, स्वस्थ पर्यावरण और अनुशासित नागरिक जीवन से होती है। यही वह दिशा है, जिसमें बिहार को अब निर्णायक कदम बढ़ाने की आवश्यकता है।" — आचार्य अशोक चौधरी प्रियदर्शी

जल निकासी और अतिक्रमण: योजनाविहीन शहरीकरण का परिणाम

जल निकासी की समस्या बिहार के लगभग प्रत्येक नगर की स्थायी समस्या बन चुकी है। थोड़ी-सी वर्षा होने पर सड़कें तालाब का रूप ले लेती हैं। इसका प्रमुख कारण केवल अधिक वर्षा नहीं, बल्कि नालियों का अतिक्रमण, समय पर सफाई का अभाव, पुराने जल निकासी तंत्र का अनुपयुक्त होना तथा अनियोजित शहरी विस्तार भी है। कई स्थानों पर नालियों पर स्थायी निर्माण कर दिए गए हैं, जिससे उनकी सफाई भी संभव नहीं हो पाती। परिणामस्वरूप बरसात का पानी निकलने के बजाय सड़कों और मोहल्लों में जमा हो जाता है।

अतिक्रमण भी शहरी अव्यवस्था का एक बड़ा कारण है। सड़कें मूलतः आवागमन के लिए बनाई जाती हैं, किंतु अनेक नगरों में उनके दोनों किनारों पर स्थायी और अस्थायी अतिक्रमण ने उनकी चौड़ाई को काफी कम कर दिया है। कई स्थानों पर दुकानों का विस्तार, अस्थायी निर्माण, ठेले, खोमचे और अवैध कब्ज़े के कारण पैदल चलने तक की जगह नहीं बचती। इससे यातायात बाधित होता है, दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ती है और आपातकालीन सेवाओं को भी कठिनाई का सामना करना पड़ता है।

विशेष चिंता का विषय यह है कि अनेक नगरों में सड़कों के किनारे ही अनियोजित हाट और बाज़ार लग जाते हैं। हाट-बाज़ार ग्रामीण अर्थव्यवस्था और स्थानीय व्यापार का महत्वपूर्ण अंग हैं, किंतु यदि उनके लिए नियोजित स्थान न हो और वे मुख्य सड़कों पर संचालित होने लगें, तो पूरा यातायात तंत्र प्रभावित हो जाता है। ग्राहक, वाहन, ठेले और पैदल यात्री एक ही स्थान पर आ जाने से न केवल जाम की स्थिति उत्पन्न होती है, बल्कि दुर्घटनाओं की संभावना भी बढ़ जाती है।

प्रशासनिक सुधार, जनभागीदारी और आधुनिक तकनीक का समन्वय

इन समस्याओं के लिए केवल नगर निकायों को दोषी ठहराना भी उचित नहीं होगा। नागरिकों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि लोग स्वयं कचरा सड़क पर फेंकेंगे, नालियों में प्लास्टिक और ठोस अपशिष्ट डालेंगे, अतिक्रमण को सामान्य मान लेंगे और सार्वजनिक संपत्ति को निजी सुविधा के लिए उपयोग करेंगे, तो कोई भी प्रशासन अकेले इन समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं कर सकता। इन समस्याओं का समाधान केवल सफाई अभियान चलाने या समय-समय पर अतिक्रमण हटाने की औपचारिक कार्रवाई से नहीं होगा। इसके लिए दीर्घकालिक, वैज्ञानिक और उत्तरदायी शहरी प्रबंधन नीति की आवश्यकता है।

सबसे पहले प्रत्येक नगर निकाय को ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की समग्र कार्ययोजना तैयार करनी होगी। घर-घर से नियमित कचरा संग्रहण, गीले और सूखे कचरे का पृथक्करण, पुनर्चक्रण इकाइयों की स्थापना तथा जैविक कचरे से खाद और ऊर्जा उत्पादन जैसी व्यवस्थाओं को प्रभावी ढंग से लागू करना होगा। इससे नगर स्वच्छ होंगे और कचरा भी संसाधन के रूप में उपयोग किया जा सकेगा। जल निकासी की समस्या का स्थायी समाधान केवल नालियों की सफाई नहीं, बल्कि समग्र जल निकासी तंत्र के पुनर्निर्माण में निहित है। प्रत्येक नगर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कर यह निर्धारित किया जाना चाहिए कि प्राकृतिक जल प्रवाह के मार्ग कहाँ हैं, कहाँ अतिक्रमण हुआ है और किन क्षेत्रों में नई नालियों तथा वर्षा जल निकासी प्रणाली की आवश्यकता है।

नगर निकायों की कार्यप्रणाली में भी व्यापक सुधार अपेक्षित है। आज आवश्यकता है कि नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायतों का मूल्यांकन केवल योजनाओं की घोषणा से नहीं, बल्कि स्वच्छता, जल निकासी, सड़क रखरखाव, यातायात प्रबंधन और नागरिक संतुष्टि जैसे मापदंडों के आधार पर किया जाए। तकनीक का उपयोग भी शहरी प्रबंधन को प्रभावी बना सकता है। नागरिकों के लिए ऐसी व्यवस्था विकसित की जा सकती है, जहाँ वे मोबाइल के माध्यम से कचरा, जलजमाव, टूटी सड़क, बंद नाली या अतिक्रमण की सूचना सीधे नगर निकाय को भेज सकें। राज्य सरकार को भी नगर विकास विभाग के माध्यम से दीर्घकालिक शहरी विकास दृष्टि-पत्र तैयार करना चाहिए। जब नगर स्वच्छ होंगे, सड़कें व्यवस्थित होंगी, नालियाँ अविरल बहेंगी, हाट-बाज़ार नियोजित स्थानों पर संचालित होंगे और नागरिक अपनी जिम्मेदारियों का ईमानदारी से निर्वहन करेंगे, तभी "विकसित बिहार" का सपना वास्तविक अर्थों में साकार होगा।

(लेखक परिचय: राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, आर्थिक, धार्मिक एवं समसामयिक विषयों पर स्वतंत्र शोध, लेखक, समीक्षक, विचारक एवं सामाजिक चिंतक।)