आचार्य अशोक कुमार चौधरी प्रियदर्शी 

इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में भारत जब वैश्विक मंच पर आर्थिक महाशक्ति बनने की दिशा में अग्रसर है, तब देश के आंतरिक ढांचे में एक मूक संकट आकार ले रहा है। यह संकट न तो केवल बेरोजगारी का है और न ही केवल आर्थिक सुस्ती का; बल्कि यह संकट योग्यता और मान्यता के बीच तेजी से चौड़ी होती उस खाई का है, जहां विश्वविद्यालय से प्राप्त उपाधियां दीवार पर सजाने के काम तो आ रही हैं, परंतु वे कॉर्पोरेट कार्यालयों, अनुसंधान प्रयोगशालाओं और तकनीकी कार्यशालाओं की व्यावहारिक आवश्यकताओं को पूरा करने में अक्षम सिद्ध हो रही हैं। 'अव्यवहारिक शिक्षा के परिणामस्वरूप डिग्री तो मिलती है परंतु कौशल नहीं'—यह उक्ति आज किसी सामान्य परिचर्चा का विषय नहीं, बल्कि देश के जनसांख्यिकीय लाभांश के समक्ष उपस्थित सबसे गंभीर भू-रणनीतिक और सामाजिक-आर्थिक चुनौती बन चुकी है।


डिग्री संपन्न, योग्यता विपन्न: आंकड़ों के आईने में भारत की वास्तविकता

विश्व के सर्वाधिक युवा देश होने का गौरव भारत के पास है। हमारी औसत आयु लगभग अट्ठाईस वर्ष है, जो यूरोपीय और पूर्वी एशियाई देशों की तुलना में कहीं अधिक अनुकूल है। परंतु इस अनुकूलता का दूसरा पहलू भयावह है। विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय रोजगारपरकता सर्वेक्षणों के अनुसार, भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों से निकलने वाले लगभग पचास प्रतिशत से अधिक स्नातक तत्काल रोजगार पाने के योग्य नहीं हैं। अभियांत्रिकी, प्रबंधन और मानविकी जैसे पारंपरिक संकायों में यह स्थिति और भी गंभीर है। तकनीकी संस्थानों से प्रतिवर्ष निकलने वाले लाखों अभियंताओं में से केवल बीस से पच्चीस प्रतिशत ही ऐसे होते हैं जिन्हें आधुनिक उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रशिक्षित माना जा सके।

समस्या यह नहीं है कि युवाओं में बौद्धिक क्षमता का अभाव है। समस्या उस व्यवस्था में है जो बौद्धिक विकास को केवल स्मरण शक्ति और परीक्षा में प्राप्त अंकों के पैमाने पर मापती है। भारतीय शिक्षा प्रणाली का एक बड़ा हिस्सा आज भी औपनिवेशिक काल की उस व्यवस्था से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया है, जिसका मूल उद्देश्य केवल प्रशासनिक व्यवस्था चलाने हेतु लिपिक वर्ग तैयार करना था। आज जब विश्व कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स, उन्नत विनिर्माण और जैव-प्रौद्योगिकी के दौर में प्रवेश कर चुका है, तब भी हमारे विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम दशकों पुरानी पाठ्यपुस्तकों और रूढ़िवादी सैद्धांतिक संरचनाओं में बंधे हुए हैं।

"शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को केवल साक्षर या उपाधिधारी बनाना नहीं, बल्कि उसे समस्याओं के समाधान योग्य व्यावहारिक दृष्टिकोण और आत्मनिर्भर कार्यक्षमता प्रदान करना है। जब उपाधि ज्ञान का प्रमाण न रहकर केवल औपचारिकता बन जाए, तो समाज बौद्धिक रूप से पंगु होने लगता है।"

सिद्धांत बनाम प्रयोग: कक्षा और कार्यस्थल की बढ़ती दूरी

व्यावहारिक शिक्षा के अभाव का मुख्य कारण शिक्षण संस्थाओं और उद्योग जगत के बीच सामंजस्य की अनुपस्थिति है। हमारे देश में अधिकांश उच्च शिक्षण संस्थान एक अलग-थलग टापू की तरह कार्य करते हैं, जिनका बाजार की मांग और तकनीकी परिवर्तनों से कोई प्रत्यक्ष संवाद नहीं होता। एक छात्र चार वर्ष तक कंप्यूटर विज्ञान की पढ़ाई करता है, लेकिन जब वह उद्योग में कदम रखता है तो पाता है कि जिन प्रोग्रामिंग भाषाओं को उसने रटा था, वे बाजार में अप्रचलित हो चुकी हैं और जिन आधुनिक तकनीकों—जैसे ब्लॉकचेन, क्लाउड आर्किटेक्चर अथवा जनरेटिव एआई—की आज मांग है, उनका पाठ्यक्रम में उल्लेख तक नहीं था।

यही स्थिति प्रबंधन और वाणिज्य के क्षेत्रों में भी दिखाई देती है। वित्तीय विश्लेषण, व्यावहारिक विपणन रणनीतियों और मानवीय संबंधों के प्रबंधन का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किए बिना केवल सिद्धांतों को पढ़कर निकलने वाले छात्र वास्तविक संकट की स्थिति में निर्णय लेने में असमर्थ रहते हैं। व्यावसायिक शिक्षा का स्तर इतना कमजोर है कि प्रयोगशालाएं केवल नाममात्र की रह गई हैं। व्यावहारिक प्रशिक्षण, जो किसी भी तकनीकी अथवा व्यावसायिक पाठ्यक्रम की रीढ़ होना चाहिए, केवल औपचारिक फाइलों और फर्जी प्रमाणपत्रों तक सिमट कर रह गया है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तकनीकी परिवर्तन की दोहरी मार

वर्तमान परिदृश्य में यह संकट और भी गहरा गया है क्योंकि तकनीकी परिवर्तन की गति अभूतपूर्व है। परंपरागत रूप से जिन सामान्य कार्यों के लिए मध्यवर्ती कौशल वाले स्नातकों को नियुक्त किया जाता था, उन कार्यों को अब स्वचालित प्रणालियां और उन्नत एल्गोरिदम अत्यंत कुशलता से कर रहे हैं। डेटा प्रविष्टि, बुनियादी कोडिंग, प्राथमिक ग्राहक सेवा और वित्तीय प्रलेखन जैसे कार्यों में मानव श्रम की आवश्यकता तेजी से घट रही है।

ऐसी स्थिति में यदि भारतीय शिक्षा व्यवस्था केवल रटंत विद्या पर आधारित उपाधियां बांटती रही, तो हम एक ऐसी पीढ़ी तैयार करेंगे जो पुराने कार्यों के लिए अनावश्यक होगी और नए तकनीकी कार्यों के लिए अयोग्य। यदि एक स्नातक को समस्या निवारण, आलोचनात्मक चिंतन, विश्लेषणात्मक क्षमता और अनुकूलनशीलता जैसे उच्च स्तरीय कौशल नहीं सिखाए गए, तो उसकी डिग्री कागज के टुकड़े से अधिक कुछ नहीं रह जाएगी। वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिके रहने के लिए केवल ज्ञान का संचय पर्याप्त नहीं है, बल्कि उस ज्ञान को व्यावहारिक परिणामों में बदलने की क्षमता अनिवार्य है।

जनसांख्यिकीय लाभांश बनाम जनसांख्यिकीय आपदा

भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से भारत इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं चीन के विकल्प की तलाश कर रही हैं और भारत को 'विश्व का कारखाना' तथा 'वैश्विक नवाचार केंद्र' के रूप में देखा जा रहा है। परंतु इस महत्वाकांक्षा की पूर्ति केवल तभी संभव है जब हमारे पास कुशल मानव संसाधन उपलब्ध हो। यदि हमारे विश्वविद्यालय उपाधियां तो बांटते रहे किंतु कुशल कार्यबल उपलब्ध कराने में विफल रहे, तो भारत का यह जनसांख्यिकीय लाभांश एक भारी सामाजिक संकट में परिवर्तित हो सकता है।

बेरोजगार या अल्प-रोजगार से जूझते शिक्षित युवाओं में हताशा और असंतोष का बढ़ना किसी भी राष्ट्र की आंतरिक स्थिरता के लिए गंभीर चेतावनी है। जब एक परास्नातक या डॉक्टरेट उपाधि धारक चपरासी या सफाईकर्मी के पद के लिए आवेदन करता है, तो यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं होती, बल्कि यह उस संपूर्ण शैक्षणिक तंत्र के दिवालियापन का सार्वजनिक उद्घोष होता है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि हमारी उपाधियां मूल्यहीन हो चुकी हैं क्योंकि वे बाजार में कोई आर्थिक मूल्य सृजित करने में असमर्थ हैं।

"डिग्री आपको साक्षात्कार के कक्ष तक पहुंचा सकती है, परंतु कार्यस्थल पर आपका अस्तित्व केवल आपका कौशल ही सुनिश्चित करता है। जिस दिन राष्ट्र उपाधियों की संख्या से परे हटकर कौशल की गुणवत्ता को प्राथमिकता देगा, उसी दिन वास्तविक आर्थिक सशक्तिकरण का मार्ग प्रशस्त होगा।"

वैश्विक उदाहरण और भारत के लिए सीख

यदि हम उन राष्ट्रों की ओर देखें जिन्होंने तीव्र गति से आर्थिक प्रगति की है, तो पाएंगे कि उनकी शिक्षा प्रणाली की धुरी व्यावहारिकता है। जर्मनी का 'डुअल वोकेशनल सिस्टम' इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहां माध्यमिक स्तर से ही छात्र अपना आधा समय कक्षा में और आधा समय उद्योगों में व्यावहारिक कार्य सीखते हुए व्यतीत करते हैं। वहां सैद्धांतिक ज्ञान और व्यावहारिक कौशल एक-दूसरे के पूरक हैं, न कि विरोधी। यही कारण है कि जर्मन विनिर्माण गुणवत्ता और परिशुद्धता का वैश्विक मानक माना जाता है।

इसी प्रकार, सिंगापुर और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने अपनी शिक्षा प्रणाली को सीधे अपनी राष्ट्रीय आर्थिक प्राथमिकताओं से जोड़ा है। उन्होंने इस मानसिकता को समाप्त कर दिया कि केवल चार वर्ष की विश्वविद्यालयी डिग्री ही सम्मानजनक जीवन का मार्ग है। उन्होंने कौशल-आधारित प्रमाणन और तकनीकी दक्षता को सामाजिक और आर्थिक प्रतिष्ठा प्रदान की। भारत को भी अपनी औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकलकर कौशल को डिग्री के समकक्ष या उससे भी उच्च दर्जा देना होगा।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति और जमीनी चुनौतियां

राष्ट्रीय शिक्षा नीति दो हजार बीस ने इस समस्या की पहचान की है और इसमें व्यावहारिक शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण और बहुविषयक दृष्टिकोण पर बल दिया गया है। नीति में इंटर्नशिप, व्यावहारिक अनुसंधान और उद्योगों के साथ सहभागिता को अनिवार्य बनाने की बात कही गई है। परंतु नीति निर्माण और उसके जमीनी क्रियान्वयन के बीच एक विशाल दूरी बनी हुई है।

देश के सुदूर क्षेत्रों और छोटे शहरों में स्थित महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में आज भी बुनियादी ढांचे का घोर अभाव है। वहां न तो आधुनिक प्रयोगशालाएं हैं, न ही प्रशिक्षित प्राध्यापक जो आधुनिक तकनीकों को सिखा सकें। जब तक हमारे शिक्षकों को स्वयं आधुनिक उद्योगों की आवश्यकताओं का ज्ञान नहीं होगा, तब तक वे छात्रों को क्या सिखाएंगे? प्राध्यापकों का मूल्यांकन केवल उनके शोध पत्रों की संख्या से नहीं, बल्कि उनके द्वारा प्रशिक्षित छात्रों की रोजगारपरकता और व्यावहारिक उपलब्धियों से किया जाना चाहिए।

उपाधि-केंद्रित समाज से कौशल-केंद्रित संस्कृति की ओर

इस संकट का एक बड़ा कारण हमारा सामाजिक दृष्टिकोण भी है। हमारे समाज में कौशल और शारीरिक श्रम को हेय दृष्टि से देखा जाता है, जबकि केवल एक सफेदपोश डिग्री को सम्मानजनक माना जाता है। एक कुशल इलेक्ट्रीशियन, प्लंबर या वेल्डर जो व्यावहारिक कार्य में दक्ष है, उसे समाज वह दर्जा नहीं देता जो एक बेरोजगार बीए या बीकॉम उपाधिधारी को मिलता है। इस मानसिकता ने युवाओं को निरर्थक डिग्रियों के पीछे भागने के लिए प्रेरित किया है।

इस सामाजिक विकृति को बदलना होगा। उद्योगों को भी अपनी भर्ती प्रक्रियाओं में सुधार करना होगा। जब तक बहुराष्ट्रीय और राष्ट्रीय कंपनियां नियुक्ति के लिए केवल डिग्री को आधार बनाती रहेंगी, तब तक छात्र कौशल की अनदेखी करते रहेंगे। यदि चयन का आधार डिग्री के स्थान पर विशुद्ध रूप से व्यावहारिक क्षमता, परियोजना अनुभव और समस्या-समाधान की योग्यता बन जाए, तो शैक्षणिक संस्थान भी अपने तौर-तरीके बदलने के लिए बाध्य होंगे।

आगे की राह: सुधार के अनिवार्य स्तंभ

इस संकट से निपटने के लिए भारत को बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाना होगा:

प्रथम, उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम का प्रत्येक दो वर्ष में उद्योग के विशेषज्ञों द्वारा पुनरीक्षण अनिवार्य किया जाए। शैक्षणिक परिषदों में उद्योग जगत के प्रतिनिधियों की केवल औपचारिक उपस्थिति न हो, बल्कि पाठ्यक्रम निर्धारण में उनकी निर्णायक भूमिका हो।

द्वितीय, उच्च शिक्षा में 'अपेंटिसशिप' अथवा व्यावहारिक शिक्षुता को डिग्री का अनिवार्य अंग बनाया जाए। बिना न्यूनतम छह माह के व्यावहारिक कार्य अनुभव के किसी भी तकनीकी या व्यावसायिक पाठ्यक्रम की उपाधि प्रदान न की जाए।

तृतीय, पारंपरिक विश्वविद्यालयों के समानांतर कौशल विश्वविद्यालयों और व्यावहारिक प्रशिक्षण केंद्रों का एक सशक्त जाल बिछाया जाए, जहां लघु-अवधि के आधुनिक प्रमाणन पाठ्यक्रम उपलब्ध हों। यह पाठ्यक्रम छात्रों को नवीनतम तकनीकों में पारंगत बनाएं।

चतुर्थ, संकाय सदस्यों के लिए निरंतर उद्योग प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाए। शिक्षकों को समय-समय पर वास्तविक कार्य परिवेश में जाकर यह देखना चाहिए कि उद्योग की कार्यप्रणाली में क्या बदलाव आ रहे हैं।

उपसंहार

भारत एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहां से एक रास्ता आर्थिक समृद्धि और वैश्विक नेतृत्व की ओर जाता है, और दूसरा रास्ता अशिक्षित उपाधिधारकों की भारी भीड़ और सामाजिक असंतोष की ओर। डिग्री केवल यह प्रमाणित करती है कि व्यक्ति ने कुछ परीक्षाएं उत्तीर्ण की हैं, परंतु कौशल यह प्रमाणित करता है कि व्यक्ति समाज और अर्थव्यवस्था के लिए मूल्यवान योगदान दे सकता है।

समय आ गया है कि हम कागजी उपाधियों के संकलन के मोह से बाहर निकलें। यदि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को व्यावहारिक दक्षता, नवाचार की क्षमता और आत्मनिर्भर कार्यकुशलता प्रदान नहीं कर सके, तो हमारी डिग्रियां केवल इतिहास के धूल भरे पन्नों में दर्ज होकर रह जाएंगी। भारत के नवनिर्माण का स्वप्न उपाधियों के अंबार पर नहीं, बल्कि कुशल, सक्षम और व्यावहारिक रूप से दक्ष हाथों की नींव पर ही साकार होगा।