लेखक: आचार्य अशोक चौधरी "प्रियदर्शी" (कटिहार, बिहार)

पाकिस्तान की वर्तमान आंतरिक और बाह्य स्थिति अब केवल राजनीतिक खींचतान या सामान्य आर्थिक मंदी का विषय नहीं रह गई है। अगस्त 2026 के इस दौर में इस्लामाबाद की सत्ता व्यवस्था एक साथ चार अलग-अलग मोर्चों पर अप्रत्याशित संकट का सामना कर रही है। दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक मानचित्र पर पाकिस्तान एक ऐसा राज्य बनता जा रहा है, जहाँ आंतरिक सुरक्षा का दायरा सिमट रहा है, क्षेत्रीय असंतोष उग्र रूप धारण कर चुका है, और राज्य की वैधता पर स्वयं उसके नागरिक प्रश्न उठा रहे हैं। बलूचिस्तान में अलगाववादी हिंसा की नई लहर, खैबर पख्तूनख्वा में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) की आक्रामक वापसी, पाक-अधिकृत कश्मीर (पीओके) में बुनियादी अधिकारों को लेकर अभूतपूर्व जनआंदोलन, और इस्लामाबाद की सत्ता संरचना में सेना का पूर्ण केंद्रीकरण—इन चारों मोर्चों ने मिलकर एक ऐसा चक्रव्यूह रच दिया है जिससे निकलना पाकिस्तानी प्रतिष्ठान के लिए दुष्कर प्रतीत हो रहा है।

पहला मोर्चा: बलूचिस्तान — अलगाववाद, संसाधन दोहन और सैन्य प्रतिरोध

बलूचिस्तान लंबे समय से पाकिस्तान का सबसे अशांत और उपेक्षित प्रांत रहा है। क्षेत्रफल की दृष्टि से पाकिस्तान का सबसे बड़ा भूभाग होने के बावजूद, यह आर्थिक और सामाजिक रूप से सबसे पिछड़ा हुआ है। यहाँ का असंतोष केवल राजनीतिक शिकायतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संसाधनों के बंटवारे, स्थानीय आबादी की उपेक्षा और राज्य द्वारा संचालित दमनकारी नीतियों से गहराई से जुड़ा हुआ है।

बलूच असंतोष की पृष्ठभूमि में विभिन्न सशस्त्र संगठन सक्रिय हैं, जिनमें बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) सबसे अधिक प्रभावकारी और उग्र संगठन के रूप में सामने आया है। बीएलए का घोषित लक्ष्य पाकिस्तान से बलूचिस्तान की पूर्ण स्वतंत्रता है। वर्ष 2026 की शुरुआत में ही बलूचिस्तान के विभिन्न जिलों—जैसे ग्वादर, तुरबत, मस्तुंग और क्वेटा—में हुए श्रृंखलाबद्ध और समन्वित हमलों ने पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों के होश उड़ा दिए हैं। इन हमलों ने यह सिद्ध कर दिया है कि दशकों तक चलाए गए सैन्य अभियानों के बावजूद अलगाववादी नेटवर्क को कमज़ोर नहीं किया जा सका है।

blockquote>"बलूचिस्तान में असंतोष की जड़ें प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और राजनीतिक अधिकारों के हनन में निहित हैं। जब तक राज्य अपनी औपनिवेशिक मानसिकता को छोड़कर स्थानीय बलूच जनता को उनका अधिकार नहीं देता, तब तक केवल बंदूक के बल पर शांति स्थापित करना असंभव है।"

बलूचिस्तान का संकट केवल सुरक्षा तंत्र तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र पाकिस्तान की भावी आर्थिक रीढ़ माने जाने वाले चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपेक) का मुख्य केंद्र है। ग्वादर बंदरगाह पर चीनी निवेश और उपस्थिति को बलूच राष्ट्रवादी अपने अस्तित्व और संसाधनों पर बाहरी कब्जे के रूप में देखते हैं। इसके परिणामस्वरूप, चीनी नागरिकों और सीपेक की परियोजनाओं पर लगातार हमले हो रहे हैं। इस स्थिति ने इस्लामाबाद और बीजिंग के कूटनीतिक संबंधों में भी दरार पैदा कर दी है। चीन अपनी परियोजनाओं की सुरक्षा को लेकर पाकिस्तान पर भारी दबाव बना रहा है, जबकि पाकिस्तानी सेना बलूच विद्रोहियों को रोकने में लगातार विफल साबित हो रही है।

दूसरा मोर्चा: खैबर पख्तूनख्वा — टीटीपी का पुनरुत्थान और अफगान-पाक सीमा पर दरार

उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत खैबर पख्तूनख्वा में पाकिस्तान को एक भिन्न लेकिन अत्यधिक घातक चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। यहाँ मुख्य विरोधी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) है। बलूच राष्ट्रवादियों के विपरीत, जो धर्मनिरपेक्ष और जातीय आधार पर स्वतंत्रता की मांग करते हैं, टीटीपी एक कट्टरपंथी इस्लामी उग्रवादी संगठन है। इसका मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान के संवैधानिक ढाँचे को ध्वस्त करके अपने कठोर उग्रवादी संस्करण के शासन की स्थापना करना है।

अगस्त 2026 के आंकड़ों और हालिया घटनाक्रमों से स्पष्ट है कि खैबर पख्तूनख्वा में पाकिस्तानी सेना और पुलिस बल दैनिक आधार पर लक्षित हमलों, आत्मघाती विस्फोटों और बारूदी सुरंगों के निशानों पर हैं। टीटीपी ने अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए अब सीधे राज्य संस्थाओं और सुरक्षा ठिकानों को अपना निशाना बनाया है।

  • सामरिक विषमता: टीटीपी गुरिल्ला युद्ध शैली का उपयोग कर रहा है, जिसमें स्थानीय पश्तून आबादी के एक वर्ग की सहानुभूति का लाभ भी उन्हें मिल रहा है।
  • डूरंड रेखा का विवाद: अफगानिस्तान के साथ सीमा पर डूरंड रेखा को लेकर काबुल की तालिबान सरकार और इस्लामाबाद के बीच तीखा विवाद बना हुआ है।
  • रणनीतिक गहराई का दुःस्वप्न: जिस 'रणनीतिक गहराई' की नीति के तहत पाकिस्तान ने दशकों तक अफगानिस्तान में उग्रवादी समूहों को संरक्षण दिया, आज वही उग्रवाद पलटकर पाकिस्तान के आंतरिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर रहा है।

पाकिस्तान लगातार काबुल में सत्तारूढ़ अफगान तालिबान पर आरोप लगाता रहा है कि वह टीटीपी को अपनी ज़मीन पर सुरक्षित पनाहगाह मुहैया करा रहा है। हालाँकि, अफगान तालिबान इन आरोपों को सिरे से खारिज करता आया है। दोनों देशों के बीच सीमा पर लगातार होती हिंसक झड़पों ने पश्चिमी सीमा को एक युद्ध क्षेत्र में बदल दिया है। पाकिस्तान अब एक साथ अपने ही नागरिकों के विरुद्ध उग्रवाद-विरोधी अभियान चलाने और अफगानिस्तान के साथ कूटनीतिक व सैन्य मोर्चे पर उलझने के लिए विवश है।

तीसरा मोर्चा: पाक-अधिकृत कश्मीर (PoK) — अधिकारों की लड़ाई और जनआंदोलन

तीसरा और अत्यंत महत्वपूर्ण मोर्चा पाक-अधिकृत कश्मीर (पीओके) है। ऐतिहासिक रूप से, पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पीओके को अपने कथित दावों के प्रतीक के रूप में पेश करता रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में, विशेष रूप से 2025 और 2026 के दौरान, इस क्षेत्र में अभूतपूर्व नागरिक असंतोष उभरकर सामने आया है।

पीओके में हो रहे विरोध प्रदर्शनों को केवल अलगाववाद के चश्मे से देखना एक बड़ी भूल होगी। यहाँ का आंदोलन बुनियादी मानवाधिकारों, आर्थिक अधिकारों और प्रशासनिक स्वायत्तता की मांग से प्रेरित है। 'संयुक्त आवामी एक्शन कमेटी' के नेतृत्व में हुए व्यापक आंदोलनों ने मुज़फ़्फ़राबाद से लेकर मीरपुर और गिलगित-बाल्टिस्तान तक जनजीवन को ठप्प कर दिया है।

"पाक-अधिकृत कश्मीर में जनता का गुस्सा इस्लामाबाद के आर्थिक शोषण, अत्यधिक बिजली दरों, आटे पर सब्सिडी खत्म करने और राजनीतिक कठपुतली सरकार के खिलाफ है। पाकिस्तान अब इस क्षेत्र में अपने प्रशासनिक नियंत्रण की वैधता खो रहा है।"

हालिया महीनों में यहाँ की स्थानीय आबादी और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के बीच तीखी झड़पें हुई हैं, जिनमें कई नागरिकों की जान गई है। स्थिति की गंभीरता को छिपाने के लिए पाकिस्तानी प्रशासन ने पीओके में विदेशी मीडिया और स्वतंत्र पत्रकारों की आवाजाही पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं। अंतर्राष्ट्रीय समाचार एजेंसियों (जैसे रॉयटर्स) की रिपोर्टों के अनुसार, स्थानीय संवाददाताओं पर दबाव बनाया जा रहा है ताकि दमन की खबरें बाहर न आ सकें। पीओके में बढ़ता यह असंतोष अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान के कश्मीर केंद्रित दुष्प्रचार की कलई खोल रहा है।

चौथा मोर्चा: इस्लामाबाद की सत्ता — सैन्य प्रभुत्व, आसिम मुनीर और आर्थिक पतन

पाकिस्तान का चौथा संकट स्वयं उसकी राजधानी इस्लामाबाद में केंद्रित है, जहाँ राजनीतिक अनिश्चितता, आर्थिक दिवालियापन और सैन्य कमान का संस्थागत केंद्रीकरण देश के लोकतंत्र को पूरी तरह निगल चुका है।

2025 में हुए विवादास्पद संवैधानिक संशोधनों के बाद, पाकिस्तानी सेना की शक्ति अपने चरम पर पहुँच गई है। फील्ड मार्शल आसिम मुनीर न केवल थल सेनाध्यक्ष हैं, बल्कि 'चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज' (सीडीएफ) का नया पद संभालने के बाद वे तीनों सेनाओं की एकीकृत कमान का नेतृत्व कर रहे हैं। इस कदम ने पाकिस्तान में असैन्य सरकार और संसद की भूमिका को महज़ एक औपचारिकता में बदल दिया है।

पाकिस्तान के राजनीतिक गलियारों में तख्तापलट की संभावनाओं पर अक्सर चर्चा होती रहती है। किंतु वस्तुस्थिति यह है कि वर्तमान में प्रत्यक्ष तख्तापलट की आवश्यकता ही नहीं है। सेना ने पर्दे के पीछे से सत्ता पर ऐसा पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लिया है जहाँ नीतियाँ, विदेश संबंध, आर्थिक फैसले और सुरक्षा ढांचा सीधे सैन्य मुख्यालय (जीएचक्यू) से संचालित हो रहे हैं।

  • आर्थिक बदहाली: पाकिस्तान भारी विदेशी कर्ज, मुद्रास्फीति और गिरते विदेशी मुद्रा भंडार के जाल में फँसा हुआ है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की शर्तें देश की आम जनता पर भारी बोझ डाल रही हैं।
  • संस्थागत गिरावट: न्यायपालिका, चुनाव आयोग और नागरिक प्रशासन की साख पूरी तरह समाप्त हो चुकी है।
  • राजनीतिक दमन: मुख्य विपक्षी नेताओं को जेल में डालकर या राजनीति से बाहर करके एकतरफा व्यवस्था बनाई गई है, जिससे जनमानस में भारी रोष है।

चारों मोर्चों का परस्पर संबंध और भू-राजनीतिक निहितार्थ

पाकिस्तान का यह चार-स्तरीय संकट अलग-अलग टुकड़ों में नहीं देखा जा सकता। ये चारों मोर्चे एक-दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं और संकट को और गहरा बना रहे हैं।

जब सेना बलूचिस्तान में बीएलए से लड़ने के लिए अपने संसाधन लगाती है, तो खैबर पख्तूनख्वा में टीटीपी को पनपने का अवसर मिलता है। जब वह पीओके में जनआंदोलनों को दबाने में व्यस्त होती है, तो आंतरिक राजनीति पर उसका पकड़ ढीला पड़ता है, जिसे सँभालने के लिए वह और अधिक दमनकारी नीतियाँ अपनाती है। इन सब सुरक्षा अभियानों का अत्यधिक आर्थिक वित्तीय बोझ अंततः पाकिस्तान की जर्जर अर्थव्यवस्था को और पतन की ओर धकेलता है।

पाकिस्तानी सैन्य नेतृत्व ने हाल के समय में कुछ कट्टरपंथी समूहों के विरुद्ध कड़ा रुख अपनाने का दिखावा किया है, ताकि पश्चिमी देशों और आईएमएफ से वित्तीय सहायता हासिल की जा सके। किंतु इतिहास गवाह है कि रणनीतिक मोहरे के रूप में उग्रवाद का पोषण करने की नीति कभी भी स्थायी सुरक्षा नहीं दे सकती। जिस 'भस्मासुर' को पाकिस्तान ने दूसरों के लिए पैदा किया था, वह अब स्वयं उसी का भक्षण कर रहा है।

भारत के लिए रणनीतिक मायने और भावी दिशा

पाकिस्तान की यह अंदरूनी उथल-पुथल भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के लिए अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण है। भारत को इस स्थिति का आकलन अत्यधिक सावधानी, परिपक्वता और रणनीतिक दूरदर्शिता के साथ करना होगा।

1. सुरक्षा सतर्कता: पाकिस्तान का आंतरिक संकट जब भी गहराता है, वहाँ का सैन्य नेतृत्व जनता का ध्यान भटकाने के लिए भारत-विरोधी दुस्साहस या सीमा पार आतंकवाद का सहारा लेने की कोशिश करता है। इसलिए, भारत की पश्चिमी सीमा और नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर सर्वोच्च सतर्कता आवश्यक है।

2. पीओके और मानवाधिकार का मुद्दा: पाक-अधिकृत कश्मीर में पनप रहे असंतोष और वहाँ हो रहे मानवाधिकार के हनन को भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तथ्यपरक ढंग से उठाना चाहिए। यह भारत के उस संवैधानिक रुख को भी पुष्ट करता है कि पूरा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख भारत का अभिन्न अंग है।

3. सीपेक और क्षेत्रीय प्रभाव: बलूचिस्तान में चीनी संपत्तियों पर हमले और सीपेक की विफलता यह दर्शाती है कि क्षेत्र में चीन का एकतरफा विस्तारवाद स्थानीय प्रतिरोध के सामने टिक नहीं सकता। भारत के लिए यह अपनी आर्थिक और कूटनीतिक प्राथमिकताओं को पुनः व्यवस्थित करने का अवसर है।

4. उग्रवाद के फैलाव का खतरा: एक अस्थिर और विखंडित पड़ोसी, जिसके पास परमाणु हथियार हों, पूरे दक्षिण एशिया के लिए एक बड़ा सुरक्षा जोखिम होता है। टीटीपी और अन्य उग्रवादी गुटों का उभार यदि अनियंत्रित होता है, तो इसका प्रभाव क्षेत्रीय सीमाओं को लांघ सकता है।

निष्कर्ष

पाकिस्तान आज इतिहास के जिस चौराहे पर खड़ा है, वहाँ से वापसी का रास्ता केवल और अधिक सैन्यीकरण से होकर नहीं जाता। बंदूक के बल पर बलूच राष्ट्रवाद को नहीं कुचला जा सकता, न ही दमन से पीओके की जनता की जायज़ मांगों को दबाया जा सकता है। टीटीपी जैसे संगठनों से निपटने के लिए विचारधारा के स्तर पर कट्टरपंथ का त्याग करना होगा, न कि केवल सतही सैन्य अभियान चलाना।

आचार्य अशोक चौधरी "प्रियदर्शी" के अनुसार, "किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी सेना की बंदूकों में नहीं, बल्कि उसके नागरिक संस्थानों की मजबूती, आर्थिक न्याय और संविधान में जनता के विश्वास में निहित होती है।" यदि पाकिस्तान अपने इन चार मोर्चों के संकट से सीख लेकर संस्थागत सुधार, लोकतांत्रिक बहाली और उग्रवाद के पूर्ण उन्मूलन का मार्ग नहीं चुनता, तो आने वाले समय में उसका यह आंतरिक बिखराव और अधिक उग्र रूप धारण कर सकता है। दक्षिण एशिया की शांति और स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि इस्लामाबाद अपने ही बोए कांटों से निपटने के लिए कौन सा रास्ता चुनता है।