पिन-भाबा पास ट्रेक सिर्फ ऊंचाई नापने की यात्रा नहीं है। यह हिमाचल प्रदेश के दो बिलकुल अलग संसारों के बीच से गुजरने वाला अनुभव है: किन्नौर की हरी, नदी के साथ चलती भाबा घाटी और लाहौल-स्पीति की ठंडी, खुली पिन वैली। अगस्त 2024 में इस ट्रेक ने मुझे यह सिखाया कि पर्वत पर आगे बढ़ने से पहले भीतर की तैयारी जरूरी होती है।

पिन-भाबा पास पर ट्रेक दल, 16,105 फीट की ऊंचाई पर
पिन-भाबा पास पर ट्रेक दल, 16,105 फीट की ऊंचाई पर

तैयारी से शुरू हुई यात्रा

बात फिटनेस से शुरू हुई थी। मेरे बैचमेट और निकट मित्र हेमंत के साथ हिमालयी ट्रेक्स पर चर्चा करते हुए पिन-भाबा का विचार सामने आया। Indiahikes के साथ 11 अगस्त 2024 का कार्यक्रम तय हुआ। शुरुआती बातचीत में 32 लोग रुचि रखते थे, लेकिन कठिनाई की शर्तें सुनकर दल सिमटता गया: एक घंटे में 10 किलोमीटर चलने या दौड़ने की क्षमता, हाल की घुटने की चोट न होना और मुश्किल परिस्थितियों के लिए तैयार रहना।

उन शर्तों ने मुझे भी आईना दिखाया। नियमित दौड़ या जिम की आदत नहीं थी, लेकिन ट्रेक शुरू होने से पहले के 20 दिनों में अनुशासन के साथ अपनी तैयारी की। मेडिकल फिटनेस, स्व-घोषणा और जरूरी सामान की सूची पूरी करते हुए यह स्पष्ट था कि पहाड़ पर कोई शॉर्टकट नहीं चलता।

किन्नौर की ओर जाते मार्ग पर पहाड़ी भू-दृश्य और मौसम
किन्नौर की ओर जाते मार्ग पर पहाड़ी भू-दृश्य और मौसम

निगुलसरी में पहला सबक: जोखिम को रोमांच मत समझिए

शिमला से काफनू के बेस कैंप की यात्रा में निगुलसरी के पास भूस्खलन ने हमें रोक दिया। ऊपर से गिरते पत्थरों के बीच रास्ता पार करने का निर्णय किसी भी ट्रेक के “रोमांच” से कहीं अधिक गंभीर था। पुलिसकर्मियों की चेतावनी, साथियों की चिंता और बदलते मौसम ने हमें याद दिलाया कि साहस का अर्थ जोखिम को हल्के में लेना नहीं है। सुरक्षित अवसर देखकर, दल और स्थानीय सलाह के साथ, हम आगे बढ़े।

निगुलसरी के पास यात्रा के दौरान ट्रेकर्स और पहाड़ी मार्ग
निगुलसरी के पास यात्रा के दौरान ट्रेकर्स और पहाड़ी मार्ग

उस शाम काफनू पहुंचकर ट्रेक लीडर ने अगले दिनों की योजना बताई। ऑक्सीजन स्तर, रक्तचाप, मौसम और समूह अनुशासन पर जोर दिया गया। पहाड़ में यह प्रशासनिक-सा अनुशासन ही असल सुरक्षा कवच बनता है।

भाबा घाटी: जंगल, नदी और साथ चलने की कला

काफनू से मुलिंग तक की चढ़ाई भाबा नदी के किनारे और शंकुधारी वनों के बीच से निकलती है। रास्ते में परिचय धीरे-धीरे दोस्ती में बदलते गए। टेंट, साझा भोजन और लंबी पैदल चाल किसी औपचारिक परिचय से कहीं बेहतर ढंग से लोगों को एक-दूसरे से मिलाते हैं।

भाबा घाटी में बादलों और देवदारों के बीच का दृश्य
भाबा घाटी में बादलों और देवदारों के बीच का दृश्य
कराह के पास ट्रेक कैंप और बादलों से घिरी घाटी
कराह के पास ट्रेक कैंप और बादलों से घिरी घाटी

रास्ते में स्थानीय जीवन और जैव-विविधता की छोटी-छोटी झलकियां भी लगातार ध्यान खींचती रहीं। जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होता; वह जल, मिट्टी, जीव-जंतु और लोगों की रोजमर्रा की सुरक्षा का साझा तंत्र है। भारतीय वन सेवा में काम करते हुए यह बात और स्पष्ट लगती है कि विकसित भारत का अर्थ केवल ढांचा खड़ा करना नहीं, बल्कि उन पारिस्थितिक प्रणालियों को मजबूत रखना भी है जिन पर समाज टिका है।

भाबा घाटी में स्थानीय पशुधन और पहाड़ी चरागाह
भाबा घाटी में स्थानीय पशुधन और पहाड़ी चरागाह

ऊंचाई पर भरोसा, अनुशासन और धैर्य

ऊंचाई बढ़ने के साथ शरीर अपनी भाषा में संवाद करता है। मौसम मिनटों में बदलता है, रास्ता लंबा लगता है और छोटे कदम महत्वपूर्ण हो जाते हैं। हमारे दल में अलग-अलग उम्र और पृष्ठभूमि के लोग थे, लेकिन गति का सिद्धांत एक था: किसी को पीछे नहीं छोड़ना। सबसे वरिष्ठ ट्रेकर गोपा गांगुली की स्थिर चाल और दृढ़ता पूरे दल के लिए प्रेरणा बनी।

स्पीति की ओर खुलती पिन वैली का विशाल परिदृश्य
स्पीति की ओर खुलती पिन वैली का विशाल परिदृश्य

पास के करीब हर कदम सांस और इच्छाशक्ति का हिसाब लेता है। अंततः सुबह करीब साढ़े आठ बजे, 16,105 फीट की ऊंचाई पर पिन-भाबा पास पहुंचना केवल एक उपलब्धि नहीं लगा। वहां खड़े होकर लगा कि तैयारी, साथियों पर भरोसा और प्रकृति के प्रति विनम्रता मिलकर ही किसी कठिन लक्ष्य को संभव बनाते हैं।

पिन-भाबा ट्रेक के दौरान तिरंगे के साथ एक यादगार क्षण
पिन-भाबा ट्रेक के दौरान तिरंगे के साथ एक यादगार क्षण
पिन-भाबा पास पर दल की सामूहिक तस्वीर
पिन-भाबा पास पर दल की सामूहिक तस्वीर

दूसरी ओर: पिन वैली का विरल सौंदर्य

पास पार करते ही परिदृश्य बदल जाता है। भाबा घाटी की हरियाली पीछे छूटती है और पिन वैली की खुली, भूरी-धूसर चोटियां सामने आती हैं। पेड़ों की जगह पत्थरों के रंग, दूर तक जाती पगडंडियां और ग्लेशियरों से आती धाराएं यात्रा को एक नया अर्थ देती हैं।

पिन वैली में ट्रेकर्स का विश्राम और हिमालयी घास का मैदान
पिन वैली में ट्रेकर्स का विश्राम और हिमालयी घास का मैदान
स्पीति की विरल पिन वैली में उतरता ट्रेकर
स्पीति की विरल पिन वैली में उतरता ट्रेकर

अंतिम दिन मुद गांव की ओर चलते हुए दल पहले दिन से बिल्कुल अलग था। कोई छोटा समूह नहीं रहा था, सब एक-दूसरे के साथ सहज थे। पिन नदी के किनारे पोस्टकार्ड लिखने का छोटा-सा अभ्यास भी यादगार रहा। मैंने अपने पुत्र के नाम एक पत्र लिखा।

विकसित भारत का वन-दृष्टिकोण

पिन-भाबा की यह यात्रा मेरे लिए निजी उपलब्धि से आगे की बात है। हिमालय हमें बताता है कि प्राकृतिक पूंजी को बचाए बिना किसी भी दीर्घकालिक विकास की नींव अधूरी है। स्वस्थ वन जलस्रोतों को सुरक्षित रखते हैं, ढलानों को थामते हैं, आजीविकाओं को सहारा देते हैं और जलवायु के झटकों के सामने समुदायों की क्षमता बढ़ाते हैं।

वनों का निर्माण केवल पौधारोपण का आंकड़ा नहीं होना चाहिए। स्थानीय प्रजातियों, समुदायों की भागीदारी, जलग्रहण क्षेत्र, आग से बचाव और लंबे समय तक देखभाल को साथ लेकर चलना होगा। यही वह विकास-दृष्टि है जिसमें प्रकृति और प्रगति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, साझेदार होते हैं।

पिन-भाबा से लौटकर मुझे सबसे अधिक यही महसूस हुआ: हिमालय पर बिताए वे पांच दिन जीवन के लिए एक स्थायी पाठ हैं। दृढ़ रहिए, विनम्र रहिए और उस प्रकृति के प्रति उत्तरदायी रहिए जो हमें हर दिन सहारा देती है।