शराबबंदी से स्मार्ट नियंत्रण: आधार आधारित व्यवस्था से सामाजिक सुधार और राजस्व संतुलन की नई राह
अशोक कुमार चौधरी
बिहार में लागू पूर्ण शराबबंदी ने एक समय सामाजिक चेतना का नया अध्याय लिखा था। इसका उद्देश्य स्पष्ट था—नशे की प्रवृत्ति को समाप्त करना, परिवारों को टूटने से बचाना और विशेषकर महिलाओं को सुरक्षित वातावरण प्रदान करना। यह निर्णय सामाजिक दृष्टि से अत्यंत भावनात्मक और नैतिक आधार पर लिया गया था, और प्रारंभिक वर्षों में इसके सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिले। किन्तु समय के साथ यह स्पष्ट होने लगा कि केवल पूर्ण प्रतिबंध किसी जटिल सामाजिक समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।
आज, 2026 में, बिहार एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ यह आवश्यक हो गया है कि शराबबंदी की मूल भावना को बनाए रखते हुए उसकी कार्यप्रणाली को अधिक व्यावहारिक, नियंत्रित और उत्तरदायी बनाया जाए। इसी संदर्भ में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरदर्शी विचार सामने आता है—शराब की बिक्री को आधार से जोड़कर नियंत्रित करना।
यह विचार केवल एक तकनीकी व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक सुधार का आधार बन सकता है। यह पूर्ण प्रतिबंध और पूर्ण स्वतंत्रता के बीच एक संतुलित मार्ग प्रस्तुत करता है, जहाँ नियंत्रण भी हो, जवाबदेही भी हो और सामाजिक न्याय भी सुनिश्चित हो।
सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि वर्तमान व्यवस्था की मूल समस्या क्या है। शराबबंदी के बावजूद नशे की प्रवृत्ति समाप्त नहीं हुई, बल्कि उसने अपना रूप बदल लिया। अवैध तस्करी, नकली शराब और अन्य नशीले पदार्थों का प्रसार इस बात का प्रमाण है कि मांग को समाप्त किए बिना आपूर्ति को रोकना दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकता। 2025 में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, बिहार में अवैध शराब से संबंधित अपराधों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई, जो शराबबंदी के बावजूद समस्या की गंभीरता को दर्शाती है।
ऐसी स्थिति में यदि शराब की बिक्री को आधार से जोड़ा जाए, तो सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि हर उपभोक्ता की पहचान सुनिश्चित हो जाएगी। यह पहचान केवल नाम तक सीमित नहीं होगी, बल्कि इससे व्यक्ति की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का भी आकलन किया जा सकेगा। आधार से लिंक करने पर, सरकार को वास्तविक समय में डेटा प्राप्त होगा, जिससे खपत पैटर्न को ट्रैक करने और अवैध गतिविधियों पर नज़र रखने में मदद मिलेगी।
यहीं से यह व्यवस्था सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बन जाती है। यदि कोई व्यक्ति निम्न आय वर्ग का है और सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ ले रहा है, तो यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि वह अपनी आय या सरकारी सहायता का दुरुपयोग नशे में न करे। उदाहरण के लिए, बिहार सरकार द्वारा चलाई जा रही 'मुख्यमंत्री ग्राम परिवहन योजना' के लाभार्थियों की शराब की खपत पर निगरानी रखी जा सकती है।
आधार आधारित प्रणाली के माध्यम से यह व्यवस्था लागू की जा सकती है कि जो व्यक्ति सरकारी सहायता प्राप्त कर रहा है, वह यदि शराब का उपभोग करता है, तो उसके लाभों की समीक्षा की जाए या उन्हें सीमित किया जाए। यह एक विवादास्पद कदम हो सकता है, लेकिन इसका उद्देश्य कल्याणकारी योजनाओं के दुरुपयोग को रोकना और लोगों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है।
यह व्यवस्था कई स्तरों पर प्रभावी परिवर्तन ला सकती है।
पहला—यह सरकारी योजनाओं की पवित्रता को बनाए रखेगी। जो संसाधन गरीबों के उत्थान के लिए दिए जाते हैं, वे नशे में व्यर्थ नहीं होंगे। इससे योजनाओं का वास्तविक उद्देश्य पूरा होगा।
दूसरा—यह व्यक्ति के भीतर आत्मनियंत्रण की भावना विकसित करेगी। यदि उसे यह ज्ञात होगा कि शराब सेवन से उसके लाभ प्रभावित हो सकते हैं, तो वह स्वाभाविक रूप से संयम बरतेगा। यह किसी दंड से अधिक प्रभावी सामाजिक नियंत्रण का माध्यम होगा।
तीसरा—यह व्यवस्था राजस्व संतुलन स्थापित करने में सहायक होगी। पूर्ण शराबबंदी के कारण राज्य को जो हजारों करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान हुआ, उसकी भरपाई नियंत्रित बिक्री से की जा सकती है। 2016 से, बिहार सरकार को आबकारी राजस्व में भारी नुकसान हुआ है, जिसका अनुमान प्रति वर्ष लगभग 5,000 करोड़ रुपये है। नियंत्रित बिक्री से प्राप्त राजस्व को पुनः समाज के विकास, स्वास्थ्य सेवाओं और नशा मुक्ति अभियानों में लगाया जा सकता है।
चौथा—अवैध तस्करी और माफिया तंत्र पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है। जब एक पारदर्शी और नियंत्रित वैध व्यवस्था उपलब्ध होगी, तो अवैध व्यापार की आवश्यकता स्वतः कम हो जाएगी। इससे कानून-व्यवस्था पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
पाँचवाँ—यह व्यवस्था नशे की निगरानी के लिए एक वैज्ञानिक आधार प्रदान करेगी। यदि कोई व्यक्ति अत्यधिक मात्रा में शराब खरीदता है, तो उसे चिन्हित कर उसके लिए परामर्श, उपचार और पुनर्वास की व्यवस्था की जा सकती है। डेटा विश्लेषण के माध्यम से, सरकार नशा मुक्ति केंद्रों और पुनर्वास कार्यक्रमों को लक्षित कर सकती है, जिससे वे अधिक प्रभावी हो सकें।
यहाँ यह भी समझना आवश्यक है कि यह मॉडल केवल आर्थिक या प्रशासनिक सुधार नहीं है, बल्कि यह एक जवाबदेह समाज निर्माण की दिशा में कदम है। इसमें व्यक्ति को उसकी स्वतंत्रता भी मिलती है और उसके व्यवहार की जिम्मेदारी भी निर्धारित होती है।
हालाँकि, इस व्यवस्था को लागू करते समय कुछ महत्वपूर्ण सावधानियाँ आवश्यक होंगी। सबसे पहले, व्यक्तिगत जानकारी की गोपनीयता सुनिश्चित करनी होगी। किसी भी प्रकार के दुरुपयोग को रोकने के लिए मजबूत व्यवस्था बनानी होगी। इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित करना होगा कि यह प्रणाली किसी वर्ग के प्रति भेदभावपूर्ण न हो, बल्कि समानता और न्याय के सिद्धांत पर आधारित हो। डेटा सुरक्षा के लिए मजबूत एन्क्रिप्शन और एक्सेस कंट्रोल उपायों को लागू करना महत्वपूर्ण है।
इसके अतिरिक्त, इस प्रणाली को लागू करने से पहले एक व्यापक जागरूकता अभियान चलाना आवश्यक है। लोगों को इस प्रणाली के लाभों और संभावित जोखिमों के बारे में शिक्षित करना महत्वपूर्ण है।
अंततः यह स्पष्ट है कि समस्या केवल शराब नहीं, बल्कि अनियंत्रित नशे की है। यदि नीति केवल प्रतिबंध पर आधारित होगी, तो समस्या नए रूप में सामने आती रहेगी। लेकिन यदि नीति नियंत्रण, पहचान, जागरूकता और पुनर्वास पर आधारित होगी, तो एक स्थायी समाधान संभव है।
बिहार ने शराबबंदी के माध्यम से एक साहसिक सामाजिक पहल की। अब आवश्यकता है कि उस पहल को समयानुकूल, व्यावहारिक और प्रभावी बनाया जाए।
आधार आधारित नियंत्रित व्यवस्था वही संतुलन प्रदान कर सकती है, जहाँ समाज सुरक्षित रहे, व्यक्ति जिम्मेदार बने और राज्य की अर्थव्यवस्था भी सुदृढ़ हो।
यही वह मार्ग है जो बिहार को नशामुक्ति के आदर्श और व्यवहारिक शासन के बीच संतुलन स्थापित करने में सक्षम बना सकता है।
लेखक परिचय
सेवानिवृत्त वरिष्ठ बैंक अधिकारी, वरिष्ठ कार्यकर्ता बीएमएस, पूर्व राष्ट्रीय सचिव AIGBOO (संबद्ध: बीएमएस), पूर्व चेयरमैन क्षेत्रीय परामर्श दात्री समिति दत्तोपंत ठेंगड़ी राष्ट्रीय श्रमिक शिक्षा एवं विकास बोर्ड, समसामयिक विषयों पर स्वतंत्र शोध लेखक, समीक्षक, विचारक, सामाजिक चिंतक

