संसद में महिला आरक्षण, नारि शक्ति वंदन अधिनियम पर संकट – और 17 अप्रैल का विरोधाभास
वर्ष 2023 में विधेयक पारित होने पर विपक्ष ने तालियां बजाईं थीं। 2029 से पहले इसे लागू करने का अवसर आया तो वही विपक्ष सदन में विरुद्ध खड़ा हो गया। बिहार की बेटियां देख रही हैं कि कौन उनके साथ है, कौन उनके विरुद्ध।
17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक गिर गया। पक्ष में 298 वोट, विपक्ष में 230 – दो-तिहाई बहुमत के 352 अंक से 54 कम। यह विधेयक कोई साधारण संशोधन नहीं था। यह वह पहल थी जो परिसीमन और जनगणना की प्रक्रिया में तेजी लाकर 2029 के आम चुनाव से पहले आरक्षण लागू कर सकती थी। विपक्ष के 230 सांसदों ने मिलकर इस पहल को ठुकरा दिया। और इसके साथ ही महिलाओं के 33 प्रतिशत आरक्षण का सपना एक बार फिर – कम से कम 2034 तक – के लिए टल गया।
कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी और इंडिया गठबंधन के अन्य घटक दल संसद के बाहर महिला सशक्तिकरण के ऊंचे-ऊंचे भाषण देते हैं। संसद के अंदर उन्होंने एक स्वर में वोट दिया – आरक्षण में देरी के पक्ष में। यह कोई विस्मयकारी घटना नहीं है। यह उनका तीस वर्षों का लगातार चरित्र है।
1996 में पहली बार महिला आरक्षण विधेयक संसद में पेश किया गया। उस दिन से लेकर 2023 तक – सत्ताईस वर्षों में – यह विधेयक छह बार गिर चुका है। इसका कारण क्या है? इतिहास की स्मृति अल्पकालिक होती है, इसलिए इसे याद दिलाना जरूरी है।
श्री लालू प्रसाद यादव ने संसद में इस विधेयक का बार-बार विरोध किया। उनकी पार्टी ने इसे "अभिजात्य महिलाओं का विधेयक" कहकर खारिज कर दिया। समाजवादी पार्टी के श्री मुलायम सिंह यादव ने बार-बार इसका विरोध किया। 1998 में तो विधेयक की प्रतियां तक फाड़ी गईं – उस दिन का दृश्य राष्ट्रीय लोकतंत्र की सबसे शर्मनाक तस्वीरों में शामिल हो गया।
कांग्रेस-नीत यूपीए सरकार ने 2010 में विधेयक राज्यसभा से पारित तो कर दिया, पर लोकसभा में इसे पारित करवाने का बहुमत कभी नहीं जुटा पाई। दस वर्षों की सरकार रही। हर बजट सत्र में भाषण दिए गए। हर चुनावी घोषणापत्र में वादा किया गया। परंतु निर्णायक कदम कभी नहीं उठाया गया। कारण स्पष्ट था – यूपीए के अपने सहयोगी पार्टियां ही इसका विरोध करती थीं।
मोदी सरकार का निर्णायक निर्णय सितंबर 2023 में नए संसद भवन में पारित पहला विधेयक नारि शक्ति वंदन अधिनियम था। यह प्रतीकात्मक भी था और प्रतिबद्धता भी। लोकसभा में 454 सांसदों ने पक्ष में वोट दिया – विरोध में मात्र 2 (AIMIM के)। सत्ताईस वर्षों से जिस विधेयक का विरोध विपक्ष ने किया, उसे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी की सरकार ने एक सत्र में पारित कर दिया। अब विपक्ष का दावा है कि वे तो 2023 में भी पक्ष में थे। यह अर्ध-सत्य है।
2023 के विधेयक में लागू करने की तिथियां परिसीमन से जोड़ी गई थीं – जो एक संवैधानिक प्रक्रिया है। सरकार ने स्पष्ट किया कि जनगणना के बाद परिसीमन होगा, तब आरक्षण लागू होगा। अप्रैल 2026 का 131वां संशोधन विधेयक इसी प्रक्रिया को तेज करने के लिए था – ताकि 2011 की जनगणना के आंकड़ों पर तत्काल परिसीमन शुरू हो और 2029 से आरक्षण लागू हो सके। विपक्ष ने ठीक उसी बिंदु पर विरोध किया जहां विधेयक वास्तविक कार्यान्वयन में बदलता। उनका "हां" केवल घोषणा पर था – कार्यान्वयन पर "नहीं"।
बिहार रास्ता दिखाता है जो यूपीए-शासित केंद्र दस वर्षों में नहीं कर पाया, वह एनडीए-शासित बिहार ने 2006 में ही कर दिखाया था – पंचायती राज संस्थाओं में 50 प्रतिशत महिला आरक्षण। बिहार भारत का पहला राज्य था जिसने यह किया। उस निर्णय का परिणाम आज आंकड़ों में स्पष्ट है – बिहार में 70,400 से अधिक महिलाएं निर्वाचित PRI प्रतिनिधि हैं, कुल प्रतिनिधियों का 54 प्रतिशत। 2001 तक बिहार में पंचायत चुनाव होते ही नहीं थे। इसके साथ ही एनडीए सरकार ने बिहार पुलिस में 35 प्रतिशत महिला आरक्षण (2013), सभी राज्य नौकरियों में 35 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण (2016), और मेडिकल-इंजीनियरिंग कॉलेजों में बालिकाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण – और बिहार भारत में पहला राज्य – लागू किया। आज बिहार पुलिस में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 26 प्रतिशत है – देश में सर्वाधिक। यह वह जमीनी सशक्तिकरण है जिसकी कल्पना भी राजद-शासन में नहीं की जा सकती थी।
2025 बिहार विधानसभा चुनाव के आंकड़े इस नाटक की पोल खोलते हैं। राजद ने 23 महिलाओं को टिकट दिया – जीतीं केवल 3। सफलता दर 13 प्रतिशत। उसी चुनाव में भाजपा – 77 प्रतिशत। एनडीए गठबंधन ने कुल 29 निर्वाचित महिला विधायकों में से 26 को सदन में भेजा। जिस पार्टी ने अपने पंद्रह वर्षों के शासन (1990–2005) में एक भी महिला को "जीताऊ" टिकट देने की दूरदर्शिता नहीं दिखाई, वह आज राष्ट्रीय महिला आरक्षण पर भाषण देती है। जिस पार्टी के सांसदों ने 17 अप्रैल को 131वें संशोधन के विरुद्ध वोट दिया – वह आज दावा करती है कि वह नारि शक्ति की सबसे बड़ी समर्थक है। बिहार की महिलाएं यह दोहरापन देख रही हैं। और उन्होंने अपना उत्तर 14 नवंबर 2025 को दे दिया – 71.6 प्रतिशत मतदान, भारत के विकसित राज्य चुनाव में सर्वाधिक रिकॉर्ड।
आगे का संकल्प 17 अप्रैल की हार अंतिम नहीं है। भारतीय जनता पार्टी का संकल्प स्पष्ट है – नारि शक्ति वंदन अधिनियम 2029 से पहले लागू हो, यही हमारा लक्ष्य है। जो विपक्ष इसमें बाधा बनेगा, उसे हर चुनाव में इसका उत्तर देना होगा। बिहार के 243 विधानसभा क्षेत्रों में से लगभग 80 क्षेत्र इस अधिनियम के लागू होते ही महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगे। बिहार के 40 लोकसभा क्षेत्रों में से लगभग 13 महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगे। जितनी देरी होगी, उतने ही देर तक यह अवसर बिहार की बेटियों से छीना जाएगा।
बिहार भाजपा अपने महिला मोर्चा को बूथ, मंडल और जिला स्तर पर सशक्त कर रही है। आने वाले चुनावों में अधिक महिला प्रत्याशियों को जीताऊ क्षेत्र देना – यही हमारी संगठनात्मक प्राथमिकता है। सुश्री मैथिली ठाकुर, सुश्री श्रेयसी सिंह – ये एक नई पीढ़ी की शुरुआत हैं। पूर्व उपमुख्यमंत्री श्रीमती रेणु देवी जैसी वरिष्ठ नेता पीढ़ी-परिवर्तन का पालन कर रही हैं। यह पाइपलाइन रुकेगी नहीं।
17 अप्रैल को विपक्ष ने जो किया, वह भारतीय लोकतंत्र में दर्ज हो चुका है। 230 सांसदों के नाम, उनके दलों के नाम – सब सार्वजनिक रिकॉर्ड पर हैं। बिहार की माताएं, बहनें और बेटियां जब अगले चुनाव में वोट देने जाएंगी, तो उन्हें याद रहेगा कि जिस दिन महिला आरक्षण को तेजी से लागू करने का अवसर आया – उस दिन सदन के किस हिस्से ने हाथ उठाया, और किसने मुंह फेर लिया।
(लेखक भारतीय जनता पार्टी, बिहार प्रदेश के अध्यक्ष हैं, और दरभंगा सदर से छह बार विधायक रहे हैं।)

