17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक पर मतदान हुआ। पक्ष में 298, विपक्ष में 230। दो-तिहाई बहुमत के लिए 352 चाहिए थे। विधेयक गिरा। इसके साथ परिसीमन विधेयक भी वापस लिया गया।
इस विधेयक का उद्देश्य सीधा था: 2011 की जनगणना के आँकड़ों पर परिसीमन शुरू करना, ताकि नारी शक्ति वंदन अधिनियम का क्रियान्वयन 2029 के आम चुनाव से पहले हो सके। लोकसभा की अधिकतम सीटें 550 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव था, जिससे किसी भी राज्य की मौजूदा सीटें कम न हों।
विपक्ष ने इसे गिरा दिया। तर्क यह दिया कि यह विधेयक परिसीमन के बारे में है, महिला आरक्षण के बारे में नहीं। लेकिन एक संवैधानिक तथ्य पर ध्यान देना ज़रूरी है: 2023 का नारी शक्ति वंदन अधिनियम स्पष्ट रूप से क्रियान्वयन को परिसीमन से जोड़ता है। बिना परिसीमन के आरक्षण लागू करने के लिए उसी अधिनियम को संशोधित करना होगा जिसे 454 सांसदों ने तीन साल पहले पारित किया था। जो दल 2023 में "हाँ" कह रहे थे, उन्होंने 2026 में उसी "हाँ" को लागू करने के तंत्र पर "नहीं" कहा।
सत्ताईस साल: एक कालक्रम
महिला आरक्षण विधेयक का इतिहास संसदीय दस्तावेज़ों में दर्ज है। तथ्य प्रस्तुत हैं:
1996–2014: नौ बार प्रस्तुत, नौ बार असफल। हर बार विधेयक के पास कागज़ पर बहुमत था। हर बार एक अल्पसंख्यक समूह ने इसे रोका। मुख्य तर्क: आरक्षण के भीतर उप-आरक्षण होना चाहिए। यह माँग सुनने में प्रगतिशील लगती है, लेकिन इसका व्यावहारिक प्रभाव यह था कि हर बार विधेयक पुनर्मसौदे के लिए भेजा गया, और हर बार समय समाप्त हो गया। उप-आरक्षण की माँग करने वाले दलों ने कभी कोई वैकल्पिक विधेयक पेश नहीं किया।
1998: विधेयक प्रस्तुत करते समय एक सांसद ने कानून मंत्री के हाथ से प्रति छीनकर सदन में फाड़ दी। यह संसदीय अभिलेख में दर्ज है।
2010: राज्यसभा ने विधेयक पारित किया। लोकसभा में सांसदों ने टेबल पर चढ़कर उपसभापति से काग़ज़ात छीनने की कोशिश की। उस समय सत्ता पक्ष के पास लोकसभा में बहुमत थी। फिर भी विधेयक वोट के लिए नहीं लाया गया। कारण: गठबंधन साझेदार सहमत नहीं थे।
सितंबर 2023: बाँध टूटा
नए संसद भवन के पहले सत्र में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित हुआ। लोकसभा में 454 पक्ष, 2 विपक्ष (AIMIM)। राज्यसभा में 214 पक्ष, शून्य विपक्ष। सत्ताईस साल की गतिरोध एक सत्र में टूट गई।
अधिनियम में क्रियान्वयन को जनगणना और परिसीमन से जोड़ा गया था। संवैधानिक दृष्टि से यह तार्किक था: आरक्षण के लिए विशिष्ट निर्वाचन क्षेत्रों की पहचान ज़रूरी है। यह पहचान परिसीमन से होती है। परिसीमन जनगणना आँकड़ों पर आधारित होता है। अनुक्रम प्रक्रियागत था, जानबूझकर विलंब नहीं।
17 अप्रैल 2026 का विधेयक इसी अनुक्रम को छोटा करने के लिए आया। प्रस्ताव था कि नवीनतम प्रकाशित जनगणना (2011) का उपयोग किया जाए। विपक्ष ने अस्वीकार किया। 130 सांसदों ने बहस में भाग लिया, जिनमें 56 महिला सांसद थीं। मतदान का परिणाम सबके सामने है।
बिहार का प्रमाण: संस्थागत निर्माण, बीस वर्षों में
महिला आरक्षण सैद्धान्तिक नहीं है। बिहार ने इसे संस्थागत वास्तविकता बनाया है:
पंचायतें: 2006 में बिहार पंचायत राज अधिनियम के तहत त्रिस्तरीय पंचायत के हर स्तर पर 50 प्रतिशत आरक्षण लागू हुआ। बिहार देश का पहला राज्य था। पहले चुनाव में 54 प्रतिशत निर्वाचित प्रतिनिधि महिलाएँ बनीं। आज 8,053 ग्राम पंचायत, 533 पंचायत समितियाँ, 38 ज़िला परिषदें महिलाओं की लगभग आधी भागीदारी के साथ काम कर रही हैं।
नगर निकाय: 2007 में 50 प्रतिशत आरक्षण नगर निकायों में लागू। कटिहार नगर निगम की मेयर उषा देवी अग्रवाल ने 2022 में 20,567 वोटों के अंतर से सीधा चुनाव जीता।
पुलिस: 2013 से 35 प्रतिशत महिला आरक्षण। BPR&D के आँकड़ों के अनुसार बिहार पुलिस बल में महिलाओं की हिस्सेदारी देश में सबसे अधिक है।
सरकारी नौकरियाँ: 2016 में सभी राज्य सरकारी पदों में 35 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण। किसी अन्य राज्य ने इस स्तर पर नहीं किया।
शिक्षा: मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में छात्राओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण। पहला श्रेय बिहार को है।
नवंबर 2025: जब महिलाओं ने उत्तर दिया
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के आँकड़े विश्लेषण की माँग करते हैं:
महिला मतदान: 71.78 प्रतिशत। पुरुष मतदान: 62.98 प्रतिशत। 37 ज़िलों में पुरुषों से अधिक महिलाओं ने मतदान किया। सुपौल में अंतर 20.71 अंक, किशनगंज में 19.5 अंक। 1951 से अब तक किसी बिहार चुनाव में इतना बड़ा लैंगिक अंतर नहीं देखा गया।
चुनावी परिणाम: एनडीए ने 25 में से 20 महिला सीटें जीतीं (भाजपा 10/12, जेडीयू 10/13)। मुख्य विपक्षी दल ने 23 महिलाओं को टिकट दिया, तीन जीतीं। यह आँकड़ा सबसे अधिक बोलता है। टिकट देना प्रतीकवाद है। जिताना संस्थागत प्रतिबद्धता है।
पश्चिम चंपारण से रेणु देवी का उदाहरण देखिए। 1988 में भाजपा महिला मोर्चा से शुरुआत, अति पिछड़े समुदाय से, 2020 में बिहार की पहली महिला उप-मुख्यमंत्री। 2025 में 91,907 वोट, 22,373 के अंतर से विजय। पाँचवीं बार उसी सीट से। कार्यकर्ता से शीर्ष तक की यात्रा संरचनागत है, प्रतीकात्मक नहीं।
आगे का रास्ता
बिहार की 243 विधानसभा सीटों में लगभग 80 सीटें नारी शक्ति वंदन अधिनियम के क्रियान्वयन के बाद महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। 40 लोकसभा सीटों में लगभग 13। 131वें संशोधन के पारित होने से यह 2029 तक संभव था। अब 2034 तक का इंतज़ार है।
सवाल यह नहीं है कि महिला आरक्षण काम करता है या नहीं। बिहार ने यह बीस साल पहले सिद्ध कर दिया। सवाल यह है कि जो दल संसद के बाहर महिला सशक्तीकरण का दावा करते हैं, वे सदन के भीतर उसी आरक्षण के त्वरित क्रियान्वयन पर "नहीं" क्यों कहते हैं।
230 सांसदों ने विरुद्ध मतदान किया। दलों के नाम, सांसदों के नाम, मतदान का समय — सब संसदीय अभिलेख में दर्ज है। बिहार की माताएँ, बहनें, बेटियाँ जब अगली बार मतदान करेंगी, तो वे इस अभिलेख को याद रखेंगी।

