पटना से दुनिया तक: गिग श्रमिकों के सम्मान, सामाजिक सुरक्षा और समावेशी विकास का नया बिहार मॉडल
आचार्य अशोक कुमार चौधरी 'प्रियदर्शी'
कटिहार, बिहार
आज का विश्व तीव्र गति से डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मोबाइल इंटरनेट और ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म ने श्रम की पारंपरिक अवधारणा को पूरी तरह बदल दिया है। कुछ वर्ष पहले तक रोजगार का अर्थ किसी कार्यालय, उद्योग, प्रतिष्ठान या संस्थान में नियमित उपस्थिति, निश्चित कार्य अवधि और मासिक वेतन से लगाया जाता था, किंतु आज लाखों लोग ऐसे हैं जो किसी एक कार्यालय के कर्मचारी नहीं हैं, फिर भी प्रतिदिन शहरों की अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाए रखते हैं। मोबाइल ऐप के माध्यम से भोजन पहुँचाने वाले डिलीवरी एजेंट, ऑनलाइन टैक्सी चालक, ई-कॉमर्स कंपनियों के पार्सल वितरक, घरेलू सेवाएँ उपलब्ध कराने वाले तकनीकी विशेषज्ञ, फ्रीलांसर तथा अन्य प्लेटफ़ॉर्म आधारित श्रमिक आधुनिक अर्थव्यवस्था की नई कार्यशक्ति के रूप में उभरे हैं। इनके बिना आज महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक का दैनिक जीवन लगभग असंभव प्रतीत होता है।
इन श्रमिकों को सामान्यतः "गिग वर्कर" कहा जाता है। "गिग" का अर्थ है—स्थायी नौकरी के स्थान पर कार्य-आधारित या अस्थायी अनुबंध के माध्यम से सेवाएँ प्रदान करना। इस व्यवस्था में श्रमिक को प्रत्येक कार्य के आधार पर भुगतान प्राप्त होता है। देखने में यह प्रणाली आधुनिक, लचीली और अवसरों से भरपूर दिखाई देती है, किंतु इसके भीतर सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य संरक्षण, आय की स्थिरता तथा श्रमिक सम्मान से जुड़ी अनेक चुनौतियाँ भी विद्यमान हैं। अधिकांश गिग श्रमिकों के पास न भविष्य निधि है, न पेंशन, न नियमित चिकित्सा सुरक्षा और न ही कार्य के दौरान विश्राम की समुचित व्यवस्था। वे आधुनिक अर्थव्यवस्था की गति बनाए रखते हैं, किंतु स्वयं अक्सर असुरक्षा और अनिश्चितता के वातावरण में कार्य करते हैं।
भारत में डिजिटल अर्थव्यवस्था के तीव्र विस्तार के साथ गिग श्रमिकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। आने वाले वर्षों में यह संख्या करोड़ों तक पहुँचने का अनुमान है। खाद्य वितरण, ऑनलाइन खरीदारी, टैक्सी सेवा, दवा आपूर्ति, घरेलू सेवाएँ, लॉजिस्टिक्स तथा डिजिटल सेवा क्षेत्र की सफलता आज बड़े पैमाने पर इन्हीं श्रमिकों की सक्रियता पर निर्भर है। कोविड-19 महामारी के दौरान जब अधिकांश लोग अपने घरों तक सीमित थे, तब यही गिग श्रमिक आवश्यक वस्तुएँ, भोजन और दवाइयाँ लोगों तक पहुँचाकर समाज की जीवनरेखा बने रहे। उस कठिन समय ने यह सिद्ध कर दिया कि ये केवल सेवा प्रदाता नहीं, बल्कि आधुनिक समाज की अनिवार्य आवश्यकता हैं।
फिर भी यह एक विडंबना रही कि जिन लोगों के श्रम पर आधुनिक शहरी जीवन आधारित है, उनके कार्यस्थल की मूलभूत आवश्यकताओं पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। अधिकांश डिलीवरी एजेंट सड़क किनारे, पेट्रोल पंपों, पार्कों या फुटपाथों पर बैठकर अगले ऑर्डर की प्रतीक्षा करते दिखाई देते हैं। भीषण गर्मी, वर्षा और शीतलहर में भी उनका कार्य निरंतर चलता रहता है। स्वच्छ पेयजल, शौचालय, मोबाइल चार्जिंग, प्राथमिक उपचार अथवा कुछ समय विश्राम करने जैसी सामान्य सुविधाएँ भी अनेक बार उनके लिए उपलब्ध नहीं होती हैं। यह स्थिति केवल आर्थिक चुनौती नहीं, बल्कि श्रम की गरिमा के प्रति समाज की संवेदनशीलता का भी प्रश्न है।
ऐसे समय में बिहार की राजधानी पटना से एक उल्लेखनीय पहल सामने आई है। पटना में स्थापित गिग वर्कर लाउंज केवल एक विश्राम केंद्र नहीं, बल्कि श्रम की गरिमा को सार्वजनिक नीति का हिस्सा बनाने का प्रयास है। यह पहल इस विचार को सशक्त करती है कि डिजिटल अर्थव्यवस्था में कार्य करने वाला प्रत्येक श्रमिक सम्मान, सुविधा और मानवीय व्यवहार का समान अधिकारी है। यदि विकास का केंद्र मनुष्य है, तो श्रमिक उसकी सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है।
इन लाउंजों में वातानुकूलित विश्राम कक्ष, बैठने की व्यवस्था, स्वच्छ पेयजल, मोबाइल चार्जिंग तथा अन्य आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराई गई हैं। पहली दृष्टि में यह व्यवस्था छोटी प्रतीत हो सकती है, किंतु सार्वजनिक नीति की दृष्टि से इसका महत्व अत्यंत व्यापक है। यह संदेश देती है कि राज्य केवल आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन लोगों की गरिमा की रक्षा के लिए भी प्रतिबद्ध है जो उस अर्थव्यवस्था को प्रतिदिन गतिशील बनाए रखते हैं।
लोकतांत्रिक शासन की सफलता केवल आधारभूत संरचना के निर्माण से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से भी मापी जाती है कि वह समाज के सबसे परिश्रमी और अपेक्षाकृत असुरक्षित वर्गों के जीवन को कितना बेहतर बनाता है। यदि कोई शहर आधुनिक सड़कें और फ्लाईओवर बना सकता है, तो वह उन श्रमिकों के लिए सम्मानजनक विश्राम स्थल भी बना सकता है जो उसी शहर की जीवनरेखा हैं। पटना की यह पहल इसी मानवीय सोच का परिचायक है।
यह पहल विकास की अवधारणा को भी नई दिशा देती है। लंबे समय तक विकास को केवल निवेश, उत्पादन और सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि से जोड़ा गया, किंतु आज यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जा रहा है कि विकास तभी सार्थक है जब उसके लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचें। समावेशी विकास का वास्तविक अर्थ यही है कि आर्थिक प्रगति के साथ श्रमिक का जीवन भी अधिक सुरक्षित, सम्मानजनक और सुविधाजनक बने।
यह पहल विकास की अवधारणा को भी नई दिशा देती है। लंबे समय तक विकास को केवल निवेश, उत्पादन और सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि से जोड़ा गया, किंतु आज यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जा रहा है कि विकास तभी सार्थक है जब उसके लाभ समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचें। समावेशी विकास का वास्तविक अर्थ यही है कि आर्थिक प्रगति के साथ श्रमिक का जीवन भी अधिक सुरक्षित, सम्मानजनक और सुविधाजनक बने।
विश्व स्तर पर भी गिग अर्थव्यवस्था तेजी से विस्तार कर रही है। अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया तथा एशिया के अनेक देशों में लाखों लोग डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से अपनी आजीविका अर्जित कर रहे हैं। इन देशों में पिछले कुछ वर्षों से यह बहस निरंतर चल रही है कि गिग श्रमिकों को पारंपरिक कर्मचारी का दर्जा दिया जाए या स्वतंत्र सेवा प्रदाता के रूप में देखा जाए। कई देशों की न्यायपालिका, सरकारें और नीति-निर्माता सामाजिक सुरक्षा, बीमा, न्यूनतम आय और श्रमिक अधिकारों के संबंध में नए मॉडल विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं। इन अंतरराष्ट्रीय अनुभवों के बीच पटना की पहल एक अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। यहाँ कानूनी वर्गीकरण से पहले श्रमिक की गरिमा और उसकी मूलभूत आवश्यकताओं को प्राथमिकता दी गई है। यही मानवीय दृष्टिकोण इस पहल को विशिष्ट बनाता है।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यदि इस मॉडल का व्यवस्थित विस्तार किया जाए, तो यह भारत के लिए एक प्रभावी सार्वजनिक नीति का आधार बन सकता है। आज आवश्यकता केवल विश्राम कक्ष उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। गिग श्रमिकों के लिए ऐसी समेकित व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए, जिसमें विश्राम, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सामाजिक संरक्षण को एक साथ जोड़ा जाए। प्रत्येक गिग श्रमिक का डिजिटल पंजीकरण, दुर्घटना बीमा, स्वास्थ्य बीमा, आकस्मिक सहायता, प्राथमिक चिकित्सा, वित्तीय साक्षरता, कौशल उन्नयन तथा भविष्य में पेंशन जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर भी गंभीरतापूर्वक विचार किया जाना चाहिए। इससे डिजिटल अर्थव्यवस्था अधिक न्यायपूर्ण और टिकाऊ बन सकेगी।
पटना के गिग वर्कर लाउंज को भविष्य में बहुउद्देशीय सेवा केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है। यहाँ ई-श्रम पंजीकरण, सरकारी योजनाओं की जानकारी, डिजिटल प्रशिक्षण, साइबर सुरक्षा जागरूकता, कानूनी परामर्श, मानसिक स्वास्थ्य सहायता तथा कौशल विकास कार्यक्रम संचालित किए जा सकते हैं। यदि इस प्रकार का समेकित मॉडल विकसित होता है, तो यह केवल विश्राम स्थल नहीं रहेगा, बल्कि गिग श्रमिकों के समग्र सशक्तिकरण का केंद्र बन जाएगा।
इस दिशा में निजी डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म कंपनियों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। जिन कंपनियों का व्यवसाय लाखों गिग श्रमिकों के परिश्रम पर आधारित है, उनके लिए यह केवल व्यावसायिक दायित्व नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व भी है कि वे अपने सेवा प्रदाताओं के स्वास्थ्य, सुरक्षा और कल्याण में सक्रिय सहयोग दें। कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR), राज्य सरकारों, नगर निकायों और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म कंपनियों के बीच समन्वित प्रयास इस दिशा में उल्लेखनीय परिणाम दे सकते हैं। जब सरकार, समाज और निजी क्षेत्र साझेदारी की भावना से कार्य करेंगे, तभी गिग अर्थव्यवस्था वास्तव में समावेशी बन पाएगी।
इस पहल का एक मनोवैज्ञानिक पक्ष भी है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है। सम्मानजनक कार्य वातावरण व्यक्ति के आत्मविश्वास, कार्यक्षमता और सामाजिक पहचान को सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। जब कोई डिलीवरी एजेंट या टैक्सी चालक यह अनुभव करता है कि समाज और शासन उसकी कठिनाइयों को समझते हैं, तो उसके भीतर अपने कार्य के प्रति गर्व और उत्तरदायित्व की भावना भी बढ़ती है। इस प्रकार ऐसी पहलें केवल सुविधाएँ नहीं देतीं, बल्कि सामाजिक विश्वास का निर्माण भी करती हैं।
बिहार की इस पहल ने यह भी सिद्ध किया है कि नवाचार केवल बड़े आर्थिक संसाधनों से नहीं, बल्कि संवेदनशील दृष्टि और दूरदर्शी सोच से जन्म लेते हैं। सीमित संसाधनों के बीच भी यदि नीति-निर्माण का केंद्र मानव हो, तो छोटे-छोटे कदम भी व्यापक सामाजिक परिवर्तन का आधार बन सकते हैं। यही कारण है कि पटना का यह मॉडल अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणा का विषय बन सकता है। यदि देश के प्रत्येक बड़े शहर, औद्योगिक क्षेत्र और जिला मुख्यालय में गिग श्रमिकों के लिए ऐसी सुविधाएँ विकसित की जाएँ, तो करोड़ों श्रमिकों के जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार संभव है।
भारत आज डिजिटल अर्थव्यवस्था की वैश्विक शक्ति बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। स्टार्टअप, ई-कॉमर्स, डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन सेवाएँ और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आने वाले वर्षों में रोजगार के नए अवसर सृजित करेंगे। स्वाभाविक है कि गिग श्रमिकों की संख्या भी तेजी से बढ़ेगी। इसलिए यह आवश्यक है कि आर्थिक विकास के साथ-साथ श्रम की गरिमा और सामाजिक सुरक्षा को भी समान प्राथमिकता दी जाए। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो विकास का लाभ अधूरा रह जाएगा। पटना की यह पहल इसी भविष्यदृष्टि का संकेत देती है।
वास्तव में "पटना से दुनिया तक" केवल एक भौगोलिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार है—ऐसा विचार जो श्रम को सम्मान देता है, विकास को मानवीय बनाता है और सामाजिक सुरक्षा को आर्थिक प्रगति का अनिवार्य अंग मानता है। यदि इस मॉडल का वैज्ञानिक मूल्यांकन कर इसे चरणबद्ध रूप से बिहार के अन्य नगरों, फिर पूरे देश में लागू किया जाए, तो भारत गिग अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में केवल तकनीकी नेतृत्व ही नहीं, बल्कि श्रमिक-केंद्रित सार्वजनिक नीति का भी वैश्विक उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम गिग श्रमिकों को केवल सेवा प्रदाता के रूप में न देखें, बल्कि आधुनिक भारत के विकास के सहयात्री के रूप में स्वीकार करें। उनकी सुरक्षा, सुविधा, सम्मान और सामाजिक संरक्षण में किया गया प्रत्येक निवेश अंततः राष्ट्र की उत्पादकता, सामाजिक स्थिरता और आर्थिक प्रगति में निवेश होगा। यही समावेशी विकास का वास्तविक स्वरूप है और यही उस भारत की पहचान भी होनी चाहिए जो तकनीकी रूप से आधुनिक होने के साथ-साथ मानवीय मूल्यों के प्रति भी समान रूप से प्रतिबद्ध है।
लेखक परिचय :
सेवानिवृत्त वरिष्ठ बैंक अधिकारी, पूर्व चेयरमैन, क्षेत्रीय परामर्शदात्री समिति, दत्तोपंत ठेंगड़ी राष्ट्रीय श्रमिक शिक्षा एवं विकास बोर्ड, श्रम एवं रोजगार मंत्रालय, भारत सरकार।

