डॉ. गोरख प्रसाद जायसवाल: ज्ञान, विज्ञान और भाषा के त्रिवेणी संगम
आज, 28 मार्च, 2026 को, हम डॉ. गोरख प्रसाद जायसवाल की जन्म-जयंती मना रहे हैं, जो एक महान गणितज्ञ, शिक्षाविद और हिंदी में वैज्ञानिक साहित्य के प्रणेता थे। वे केवल एक गणितज्ञ नहीं थे, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा, आधुनिक विज्ञान और मातृभाषा के समन्वय के अद्वितीय प्रतीक थे। उनका जीवन शिक्षा, अनुसंधान और समाजोपयोगी ज्ञान के प्रसार के लिए समर्पित था।
डॉ. जायसवाल का जन्म 28 मार्च 1896 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा से ही यह स्पष्ट हो गया था कि वे असाधारण प्रतिभा के धनी थे। काशी हिंदू विश्वविद्यालय से गणित में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात उन्होंने प्रख्यात गणितज्ञ डॉ. गणेश प्रसाद के निर्देशन में शोध कार्य किया। ज्ञान की खोज उन्हें एडिनबरा विश्वविद्यालय तक ले गई, जहाँ से उन्होंने 1924 में गणित में डी.एस-सी. की उपाधि प्राप्त की। उस समय यह उपलब्धि अत्यंत दुर्लभ और गौरवपूर्ण मानी जाती थी, जो उनके बौद्धिक सामर्थ्य और अंतरराष्ट्रीय स्तर की विद्वत्ता का प्रमाण है।
1925 से 1957 तक प्रयाग विश्वविद्यालय के गणित विभाग में रीडर के रूप में उनका दीर्घ कार्यकाल भारतीय उच्च शिक्षा जगत में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने गणित जैसे जटिल विषय को सरल और व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत कर विद्यार्थियों में तार्किकता, अनुशासन और विश्लेषणात्मक सोच विकसित की। उनके अनेक शिष्य आगे चलकर प्रतिष्ठित शिक्षाविद् एवं वैज्ञानिक बने, जो उनके प्रभावी शिक्षण और मार्गदर्शन की सफलता का प्रमाण है। प्रो. कृष्ण बल्लभ शरण, जो बाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गणित विभाग के अध्यक्ष बने, उनके प्रमुख शिष्यों में से एक थे।
डॉ. जायसवाल का सबसे विशिष्ट योगदान हिंदी में वैज्ञानिक साहित्य का सृजन है। जिस समय विज्ञान की शिक्षा अंग्रेज़ी तक सीमित थी, उन्होंने हिंदी को वैज्ञानिक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाकर ज्ञान के लोकतंत्रीकरण का मार्ग प्रशस्त किया। ‘सरल विज्ञानसागर’, ‘फल संरक्षण’, ‘घरेलू डॉक्टर’, ‘तैरना’ और ‘तर्कीबें एवं हुनर’ जैसी उनकी कृतियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि उन्होंने विज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने का सफल प्रयास किया। हिंदी विश्वकोश के संपादन कार्य में उनका योगदान भी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा, जिससे वैज्ञानिक ज्ञान का व्यवस्थित संकलन और प्रसार संभव हुआ।
आज, जब भारत सरकार नई शिक्षा नीति 2020 के तहत मातृभाषा में शिक्षा को बढ़ावा दे रही है, डॉ. जायसवाल का योगदान और भी प्रासंगिक हो गया है। नई शिक्षा नीति का उद्देश्य छात्रों को उनकी मातृभाषा में सीखने और सोचने के लिए प्रोत्साहित करना है, जिससे वे बेहतर ढंग से समझ सकें और ज्ञान का सृजन कर सकें। डॉ. जायसवाल ने दशकों पहले ही इस आवश्यकता को महसूस कर लिया था और हिंदी में वैज्ञानिक साहित्य का सृजन करके इस दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।
खगोल विज्ञान और ज्योतिष के क्षेत्र में भी उनकी गहरी रुचि थी। ‘आकाश की सैर’, ‘सूर्य सारणी’, ‘चंद्र सारणी’, ‘निहारिका’ तथा ‘भारतीय ज्योतिष का इतिहास’ जैसी कृतियाँ यह दर्शाती हैं कि वे परंपरागत भारतीय ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के समन्वय के पक्षधर थे। उन्होंने ज्योतिष को अंधविश्वास से परे ले जाकर गणितीय और खगोलीय आधार पर समझाने का प्रयास किया, जो उस समय एक अभिनव दृष्टिकोण था। आज भी, भारतीय ज्योतिष के वैज्ञानिक पहलुओं पर शोध जारी है, और डॉ. जायसवाल का काम इस क्षेत्र में प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।
डॉ. जायसवाल ने स्वतंत्र भारत के निर्माण काल में बौद्धिक स्तर पर भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संविधान सभा से जुड़े परामर्श कार्यों में उनकी सहभागिता यह दर्शाती है कि वे केवल एक शिक्षक या लेखक नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय चिंतक भी थे। उनकी दृष्टि व्यापक थी और वे शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का सशक्त माध्यम मानते थे।
उनकी साहित्यिक एवं वैज्ञानिक कृतियों को अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। ‘फोटोग्राफी’ पर उन्हें हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा मंगला प्रसाद पारितोषिक प्रदान किया गया, जबकि ‘सौर परिवार’ जैसी कृतियों पर उन्हें अन्य सम्मान भी प्राप्त हुए। ये पुरस्कार उनके ज्ञान, शोध और समाजोपयोगी दृष्टिकोण की व्यापक स्वीकृति के प्रतीक हैं।
उनका जीवन जितना विद्वतापूर्ण था, उतना ही मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण भी था। 5 मई 1961 को वाराणसी में अपने सेवक के प्राणों की रक्षा करते हुए उनका निधन होना इस बात का प्रमाण है कि वे केवल सिद्धांतों के नहीं, बल्कि आचरण के भी महान व्यक्ति थे। उनका यह त्यागमय अंत उनके व्यक्तित्व को और अधिक ऊँचाई प्रदान करता है।
आज उनकी जन्म-जयंती के इस स्मृति दिवस पर हम उन्हें नमन करते हुए उनके आदर्शों को आत्मसात करने का संकल्प लें। ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाना, विज्ञान को सरल बनाना और समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास की किरण पहुँचाना—यही उनके जीवन का संदेश है।
आज के समय में, जब विज्ञान और प्रौद्योगिकी का महत्व बढ़ रहा है, डॉ. जायसवाल के योगदान को याद रखना और भी महत्वपूर्ण है। हमें उनके उदाहरण से प्रेरणा लेनी चाहिए और विज्ञान को आम लोगों तक पहुंचाने के लिए प्रयास करना चाहिए। हमें अपनी मातृभाषा में वैज्ञानिक साहित्य का सृजन करना चाहिए और छात्रों को उनकी मातृभाषा में विज्ञान सीखने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
डॉ. जायसवाल का जीवन हमें यह भी सिखाता है कि हमें ज्ञान और विज्ञान को मानवता की सेवा में उपयोग करना चाहिए। हमें समाज के गरीब और वंचित लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी का उपयोग करना चाहिए। हमें एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहिए जहाँ सभी लोगों को शिक्षा और विकास के समान अवसर मिलें।
डॉ. गोरख प्रसाद जायसवाल एक महान व्यक्ति थे जिन्होंने अपने जीवन को ज्ञान, विज्ञान और समाज की सेवा में समर्पित कर दिया। उनकी स्मृति को चिरस्थायी बनाए रखने के लिए, हमें उनके आदर्शों को आत्मसात करना चाहिए और उनके सपनों को साकार करने के लिए प्रयास करना चाहिए।
भारत सरकार ने भी डॉ. जायसवाल के योगदान को मान्यता दी है और उनके नाम पर कई संस्थानों और योजनाओं की स्थापना की है। 2025 में, विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने डॉ. गोरख प्रसाद जायसवाल राष्ट्रीय विज्ञान पुरस्कार की स्थापना की, जो विज्ञान के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए दिया जाता है। यह पुरस्कार डॉ. जायसवाल के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है और विज्ञान के क्षेत्र में युवाओं को प्रेरित करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
इसके अतिरिक्त, कई विश्वविद्यालयों और कॉलेजों ने डॉ. जायसवाल के नाम पर छात्रवृत्ति और अनुसंधान अनुदान की स्थापना की है। ये छात्रवृत्ति और अनुदान छात्रों को विज्ञान और गणित के क्षेत्र में उच्च शिक्षा प्राप्त करने और अनुसंधान करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
डॉ. जायसवाल के जीवन और कार्यों पर कई पुस्तकें और लेख प्रकाशित किए गए हैं। ये पुस्तकें और लेख उनके जीवन, उनके योगदान और उनके विचारों के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं। वे छात्रों, शिक्षकों और आम लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
आज, उनकी जन्म-जयंती पर, हम एक बार फिर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनके आदर्शों को आत्मसात करने का संकल्प लेते हैं।
ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाना, विज्ञान को सरल बनाना और समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास की किरण पहुँचाना—यही उनके जीवन का संदेश है।
उनकी पुण्य स्मृति में विनम्र श्रद्धा-सुमन अर्पित।

